आज़ाद आसमान के निचे हम कितने आज़ाद ?
“15 अगस्त की खुशियों के बीच एक बड़ा सवाल—क्या सच में हर भारतीय आज़ाद है?”
लेकिन एक सवाल रह गया....
क्या आज़ादी सिर्फ़ नारे लगाने की है, या सवाल पूछने की भी?
क्या आज़ादी सिर्फ़ अपनी बात कहने की है, या उस बात से असहमत होने वाले को सुनने की भी?
किसान का अपनी बात कहना, एक पत्रकार का बिना दबाव सच लिखना, और एक आम नागरिक का बिना डर सवाल करना भी आज़ादी का हिस्सा है?
क्या आज़ादी सिर्फ़ इतनी है कि हम हर साल एक दिन तिरंगा फहराएँ और अगले दिन उसी देश में किसी की आवाज़ को दबा दें?
क्या एक लड़की का रात में बेख़ौफ़ घर लौटना, एक मज़दूर का सम्मान से जीना, एक किसान का अपनी बात कहना, एक पत्रकार का बिना दबाव सच लिखना, और एक आम नागरिक का बिना डर सवाल करना भी आज़ादी का हिस्सा है?
हम हर साल आज़ादी का जश्न मनाते हैं, बस कभी-कभी ये भूल जाते हैं कि आज़ादी सिर्फ़ अंग्रेज़ों से मिली मुक्ति का नाम नहीं, बल्कि डर, भेदभाव, चुप्पी और अन्याय से मुक्ति का नाम भी है।
15 अगस्त तो हर साल आएगा, तिरंगा भी हर साल लहराएगा। बस उम्मीद है कि किसी दिन आज़ादी सिर्फ़ कैलेंडर की एक तारीख़ नहीं, बल्कि हर इंसान की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाई देगी।
– आज़ादी मुबारक।


